Saturday, 13 July 2013

एक कली खिली चमन में

एक कली खिली चमन में

एक कली खिली चमन में
बन गई थी वो फूल
बड़ा गर्व हुआ अपने में

सब को गई थी वो भूल

कहा चमन ने फिर उससे
यहाँ रहता स्थिर नहीं कोई
मत कर तू गुमान इतना
उसको बहुत समझाया
आज तो यौवन है पर
कल जब तू ठूंठ हो जाएगी
तब कोई तेरे दर्द में
सहानुभूति नहीं दिखलाएगा
हंसकर मिलजुलकर मिल
फिर से सब में खो जा तू
अलग बनाया अस्तित्व जो तूने
अपने से तू भी जाएगी
कोई मालीराहगीर ही
तुझको तोड़ ले जाएगा
मिट जाएगा जीवन तेरा फिर
अन्तकालतू पछताएगी

दीया अंतिम आस का

दीया अंतिम आस का


[एक सिपाही की शहादत के अंतिम क्षण ]

दीया अंतिम आस का, प्याला अंतिम प्यास का

वक्त नहीं अब, हास परिहास उपहास का
कदम बढाकर मंजिल छूलूँ, हाथ उठाकर आसमाँ
पहर अंतिम रात का, इंतज़ार प्रभात का
बस एक बार उठ जाऊँ, उठकर संभल जाऊँ
दोनों हाथ उठाकर, फिर एक बार तिरंगा लहराऊँ
दुआ अंतिमर बसे, कण अंतिम अहसास का
कतरा अंतिम लहू का, क्षण अंतिमश्वास का
बस एक बूँद लहू की भर दे मेरी शिराओं में
लहरा दूँ तिरंगा मैं इन हवाओं में........
फहरादूँ विजय पताका चारों दिशाओ में
महकती रहे मिट्टी वतन की, गूंजती रहे गूंज जीत की
सदियों तक सारी फिजाओं में………..
सपना अंतिम आँखों में, ज़स्बा अंतिम साँसों में
शब्द अंतिम होठों पर, कर्ज अंतिम रगों पर
बूँद आखरी पानी की, इंतज़ार बरसात का
पहर अंतिम रात का, इंतज़ार प्रभात का…
अँधेरा गहरा, शोरमंद,
साँसें चंद, हौंसला बुलंद,
रगों में तूफान, ज़ज्बों में उफान,
आँखों में ऊँचाई, सपनों में उड़ान
दो कदम पर मंजिल, हर मोड़ पर कातिल
दो साँसें उधार दे, कर लूँ मैं सब कुछ हासिल
ज़ज्बा अंतिम सरफरोशी का,
लम्हा अंतिम गर्मजोशी का
सपना अंतिम आँखों में, ज़र्रा अंतिम साँसों में
तपिश आखरी अगन की, इंतज़ार बरसात का
पहर अंतिम रात का, इंतज़ार प्रभात का…
फिर एक बार जनम लेकर इस धरा पर आऊँ
सरफरोशी में फिर एक बार फ़ना हो जाऊँ
गिरने लगूँ तो थाम लेना, टूटने लगूँ तो बाँध लेना
मिट्टी वतन की भाल पर लगाऊँ
मैं एक बार फिर तिरंगा लहराऊँ
दुआ अंतिम रब से, कण अंतिम अहसास का
कतरा अंतिम लहू का, क्षण अंतिमश्वास का .....

कौमी एकता का हमें हार चाहिए

कौमी एकता का हमें हार चाहिए


 एक माँ का दोनों को दुलार चाहिए 

बैर नहीं आपस में प्यार चाहिए


आरती-नमाज में न खून हो सके 

कौमी एकता का हमें हार चाहिए 

कौमी एकता का हमें हार चाहिए


मंदिर या मस्जिद अजाब नहीं हो 

बाँटे जो दिलों को वो किताब नहीं हो
 
दिल में किसी के कोई घाव नहीं हो 

मानव में जाति भेद-भाव नहीं हो 

भारत की एकता के तार चाहिए 

गंगा नहीं संगम की धार चाहिए 

कौमी एकता का हमें हार चाहिए


नफरत की आग में जले न कोई आज 

सोमनाथ मंदिर या आगरा का ताज
 
सर्वधर्म बगिया में लगे न कोई आग 

लुट सके न शांति यज्ञ में कोई सुहाग 

भिन्नता में एकता बहार चाहिए 

टूटे जो कभी न वह कतार चाहिए 

कौमी एकता का हमें हार चाहिए


नानक, रहीम, राम की यह भूमि है 

ख्वाजा अजमेर कहीं बृज-भूमि है 

गीत गूंजते हैं मीरा, रसखान के 

गाँधी औ' सुभाष की ये कर्म-भूमि है 

सिर्फ जिंदगी का हमें सार चाहिए 

राष्ट्र धर्म के हमें सुविचार चाहिए 

कौमी एकता का हमें हार चाहिए